•”मृत्योर्मा अमृतं गमय।” बृहदारण्यक उपनिषद के श्लोक 1.3.28 में की गई तीन प्रार्थनाओं में ये अंतिम और शायद सबसे सुंदर है। इसका अर्थ है, “मृत्यु नही, (मुझे) अमृत की ओर ले चलो।”
•सठियाने के बाद हम मनुष्यों (Senior Citizens) की वारंटी समाप्त सी ही समझी जाती है! शरीर एक क्षण या कुछ वर्ष चल भी सकता है; और नही भी। ये मिट्टी, एक दिन, मिट्टी में मिल ही जानी है। इस सच्चाई से हम ज्यादातर लोग डरते हैं और हर कीमत पर ‘शरीर’ को जीवित रखने की कोशिश करते जाते हैं। जितना तीव्र ये प्रयास होता है मरने का ‘डर’ उतना ही गहन होता चला जाता है।

•पर शरीर का छूटना तय है तब वास्तविक समस्या मृत्यु नही, बल्कि मृत्यु का ‘भय’ है! इस भय को कम करने के उपाय बुद्ध पुरुषों ने हमें बताए हैं। “यम-नचिकेता” संवाद में “ॐ” को, मृत्यु-भय के निदान के रूप में समझा जा सकता है; ऋषि कहता है:
एतदालंबनमं श्रेष्ठं, एतदालंबनमं परम; एतदालंबनमं ज्ञात्वा, ब्रह्म-लोके महीयते। (कठोपनिषद, 1.2.17) अर्थात ये ‘ॐ’ सर्वश्रेष्ठ आश्रय है, ये सर्वोच्च आश्रय है; इस आश्रय को जानकर, साधक, ‘ब्रह्म’ में महिमा प्राप्त करता है। अर्थात जो मरणशील (शरीर) है उसे स्वयं (आत्मा) से अलग देखकर, अभ्यास-कर्ता, मृत्यु-भय से मुक्त हो जाता है।
This way do the Omkar Recitation!
•मेरा सुझाव है कि हम Senior Citizens, जिनके पास spare समय और ऊर्जा है, ॐ कार का संतुलित उच्चारण करें। Balanced recitation of Omkar नियमित रूप से, एक समुचित मात्रा में (11/21 cycles, once a day before break fast), निष्ठा से करना चाहिए। इससे शीघ्र ही हमारे जीवन का कम्पास आत्मिक दिशा में स्थिर हो जायेगा और कुछ सप्ताह में हीअपने साहस और आत्मविश्वास, स्वासतंत्र & स्नायुतंत्र आदि में सुधार अनुभव कर सकेंगे। बेहतर स्वास्थ्य एवं उच्चतर आत्मविश्वास के साथ जीते हुए, दूसरों को भी प्रेरित कर पाएंगे अन्ततः ‘अभय’ चेतना (God Consciousness)में प्रगति कर सकेंगे।
•शुभकामनाएं!