•’पाप’ हैं जैसे छाती पे रखे भारी पत्थर; यें सांस नही लेने देते। पाप-कर्म हैं क्या? वेद व्यास ने कहा, ‘पापाय परपीडनं’! वो पीड़ायें (hurts) जो, अपमान करके, अपना दिया हुआ वचन तोड़के (धोखा देके), हम किसी को देते हैं..willfully, knowingly.

•हम साठ के पार वालों के लिये उचित ही है कि इन पत्थरों का बोझ कम करने का प्रयास निष्ठापूर्वक करें, करते रहें। उपाय? Corrective steps का वक्त शायद अब निकल गया हो; तब बस एक ही रास्ता है: “हृदय से, क्षमा याचना करना और क्षमा दान दे देना।”
•ग़ालिब का सुन्दर सा शेर है: “इस तरहा मैंने ग़ालिब जिंदगी को आसाँ कर लिया; किसी से मांग ली माफ़ी, किसी को माफ़ कर दिया।” क्षमा मांगते वक्त उस पीड़ा को महसूस करना जरूरी है जो हमारे कारण उस व्यक्ति को हुई थी। यदि आप पूरी निष्ठा से ऐसा कर पाएं तो फिर वो व्यक्ति आपको स्पष्टतः क्षमा करे या ना करे; आपकी छाती से एक पत्थर निश्चित कम हो जाएगा। पर ऐसे मौके पर ईमानदारी अक्सर कम पड़ जाती है।
•वैसे सभी लोग क्षमा याचना की कीमिया जानते भी नहीं। मतलब कि किसी ने हमारा दिल दुखाया और वो नही जानता कि ये ‘मानस-हंस’ चीज क्या है तो वो तो हमसे क्षमा मांगेगा नही। और उसकी दी हुई hurt को हम छाती में लिए बैठे हैं।

•ऐसे में समझदारी इसी में है कि जिसने मुझे पीड़ा दी, मैं पहल करके उसे माफ़ करदूं, और वो पत्थर भी अपने सीने से हटा दूं जो किसी और ने रखा है! अंग्रेजी की ये कहावत यही सीख देती है..‘To forgive is to release a prisoner and see that it was you!’
•आप समझ ही रहे हैं कि माफ़ी मांगने और माफ़ी देने, दोनों ही सूरतों में खुद पहल करें तो चित्त को काफी निर्भार करके अपने प्रयाण को संतोष से भर सकते हैं!
*शुभकामनायें।