मस्तिष्क के तपते ‘मरुस्थल’ से हृदय के शीतल ‘मरुद्यान’ की ओर!

Over staying at the seat of thought!

•मस्तिष्क, head-center, बुद्धि; तनाव (tension) की सीट है। जरूरत से ज्यादा समय इस सीट पे गुजारने का मतलब यहां विचारों की घुड़दौड़ उतनी ही ज्यादा होगी। परिणाम जीवन में बेचैनी, थकान, तनाव (stress) और पता नहीं क्या क्या! अरे भई वो तो ठीक है पर इसके अलावा और कौन सा ‘तीर्थ’ है जहाँ चले जाएं?

•है एक तीर्थ बंधुवर। Heart-center, हृदय! बीच बीच में कुछ समय अपने हृदय, दिल के करीब गुजारें। ओके..वहां पहुँचें कैसे भाईजान? कुछ सुझाव हैं;

Embodied affection!

•यदि आप एक नवजात, नन्हे छोटे बच्चे के माँ-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी, ताऊ-ताई आदि हैं तो उस शिशु को जब-तब स्नेह, लाड़-दुलार देने, उसके साथ खेलने का पर्याप्त अवसर निकाल लें। उतनी देर आप दिल मे जियेंगे, और (दिमाग से बाहर) सुकून में होंगे।

•आस पास खिले फूल, पौधे, पेड़; पशु- पक्षी की और स्नेह-पूर्ण दृष्टि भी शांत रहने और relax होने में मदद करती है। बचपन में वो मुहल्ले में पैदा हुए नवजात पिल्लों के साथ जो भी खेल पाए वो जानते हैं कि उस स्नेह की छोटी सी निष्काम यात्रा के सहारे अभी भी हम भाव-स्नान कर सकते हैं, दिमागी घुड़दौड़ से बच सकते हैं, दिल का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

That little Smile holds the secret!

•एक और सार्वभौमिक (universal) और तुरंत कारगर तथा सरलतम रास्ता भी है जो split second में काम करता है। क्या है बंधु? Smile (मुस्कान)! इधर मुस्कुराए उधर सीधे भाव-आसन, हृदय (heart center) में! Entire body-mind is instantaneously relaxed at that moment! बस फिर 5, 10 मिनेट आंख बंद करके, ऐसे ही चेहरे पे मुकुराहट के साथ, शांत बैठे/लेटे रहें। ऐसे समय आप भाव पूर्ण हृदय में होंगे और आपको ‘प्रेम’ अनुभव हो रहा होगा और बुद्ध जनों ने बताया है कि ‘प्रेम ही परमात्मा है!’..’इश्क ख़ुद क़ायनात है!’ इन बड़े बड़े अनुभवों की छोटी छोटी झलक भी अपने लिए पर्याप्त हैं बंधुवर!

•प्रेम, स्नेह, श्रद्धा ये एक ही भाव के तीन रूप हैं जो हमे मष्तिष्क से हृदय तक ले जा सकते हैं। बस चेहरे पे मुस्कान जरूर बनाये रखे जो कि आवश्यक है और अपने वश में भी है। 24 घंटे में दो, तीन, चार बार ये प्रयोग करके लाभ ले सकते हैं।

शुभकामनाएं!

7 Replies to “मस्तिष्क के तपते ‘मरुस्थल’ से हृदय के शीतल ‘मरुद्यान’ की ओर!”

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